जब मैं घर आया

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सांझ हुई जब
मैं घर आया,
तब सपनों का
महल सजाया,
संग में थकान
दिन भर की,
आंखों में उम्मीदें
जीवन भर की,
दिन में था
तन्हा अकेला,
रात में संग
यादों का मेला,
कैसे मैं उसे पास बुलाऊँ
कैसे मैं उसे अपनी बात समझाऊँ…
मुश्किल बड़ी है,
मन से मन की लड़ाई…
संकट में है मन
सांसे भी कुछ समझ न पाई..
पास रही वो आंखों के मेरी
वो चांदनी रात
वो सुबह सुनहरी..
कुदरत की ये
कैसी रचना है..
जो मन को भाए
उससे ही बचना है…
उसके इशारे भी
मैं समझ न पाया…
सांझ हुई जब
मैं घर आया…
रात दीवानी
उसे तीर(पास) बुलाए,
पर वो पत्थर दिल
मेरी पीर समझ न पाए…
मैं भी चाहूँ..
कि वो नजरें मिलाए…
पर आंखों के दरबाजे
खोल न पाए…
न वो जीती
न मैं हारा…
अजब सा ये
मेल हमारा…
उसकी तारीफों में
खुद को लुटाया…
सांझ हुई जब
मैं घर आया……

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Author: Abhishek Pratap Singh

the life is smallest distance between born and death.

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